mayursblog here...:
महान भारतीय गणितज्ञ श्रीनि...: महान भारतीय गणि तज्ञ श्रीनिवास रामानुजन के १२५वे जन्म दिवस पर फ्लोरिडा विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित व्याख्यानमा...
mayursblog here...
Monday, 31 December 2012
उनके द्वारा दिया गया यह आखिरी सूत्र १९२० ईस्वी से लेकर अब तक एक रहस्य बना हुआ था और कई सारे पश्चिमी और पश्चिम से ओतप्रोत गणितज्ञ ऐसे भी थे जिन्होंने उसे गलत मान लिया था बिलकुल उसी तरह जैसे की हमारे पुरातन ग्रंथो में लिखी कई बाते समझ से बाहर होने पर बिना किस सिद्ध करने के प्रयास के सीधे गलत मान लिया जाता है और हसी का पात्र बनाया जाता है.
२२ दिसम्बर को आयोजित इस व्याख्यानमाला में यह सिद्ध हुआ है की उन्होंने जो सूत्र देवी नामागिरी से प्राप्त करके आचार्य हर्डली को प्रेषित किया था वो सृष्टि के रचना के लिए उत्तरदाई Black holes के लिए था और Black holes को मात्र उसी गणितीय सूत्र से समझ जा सकता है. बेहद आश्चर्य की बात है की Black hole का विचार सबसे पहले भौतिक विज्ञानी 'Stephen Hawking' ने अपने पुस्तक 'A Brief History of Time' में सन १९८८ ईसवी में दिया था वो मात्र 'hypothesis' के रूप में .जबकि उसी को सिद्ध करने का सिद्धांत (concept) श्रीनिवास रामानुजन ने १९२० में दे दिया था.
पर महत्व की बात ये है की नीच भारतीय मीडिया के कुछ छिछोरे इस पर अपनी सेक्युलरगिरी करने से बाज़ नहीं आये. कुछ बड़े पत्रकारों ने यहाँ तक लिख दिया है की भारत ने रामानुजन के प्रतिभा के देवी देवताओं से जोड़कर उनका बड़ा अपमान किया है और उनकी मेहनत को कम प्रदर्शित करने के लिए ये कहानी बनायी गयी है. ये नीच पत्रकार क्या यह बताने की कोशिस करेंगे की क्या ईश्वरीय शक्तियों से सीधे सम्बन्ध स्थापित करना कोई आसान या अल्प साधना का कार्य है क्या ???
नीच अपनी नीचता से कभी बाज़ नहीं आते , कुत्ते है तो भोकेंगे ही
Sunday, 30 December 2012
LEGISLATIVE ASSEMBLIES
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
Note :-
1* Term of Jammu & Kashmir Assembly is for 6 years (Art 52 of Constitution of J&K)
2** Including 5 seats of Uts of A&NI, Chandigarh, D&NH, D&D and Lakshadweep.
3*** Including 12 nominated members.
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क्या आप जानते हो की सावरकर जी ने अपने जीवन के कितने दिन जेल में गुजारे ?
30 जनवरी 1948 को गाँधी का वध किया गया हुतात्मा पंडित नाथूराम गोडसे की गोलियों द्वारा, नेहरु की द्वेष बुद्धू के फलस्वरूप इस घटना से सावरकर जी का कोई सम्बन्ध न होने पर भी उन्हें गाँधी वध का अभियुक्त बनाया गया किन्तु न्यायलय ने उन्हें निर्दोष माना और मुक्त कर किया l
17 वर्षों के बाद 21 दिन तक निराहार रह कर आयु के 83वें वर्ष, 26 फरवरी 1966 को सावरकर जी ने आत्मार्पण किया, शास्त्रों में अंधश्रद्धा न रखने वाले सावरकर जी निराहार रह कर परलोक सिधारे और जीवन भर अनशन तथा सत्याग्रह करने वाला गाँधी ... पिस्तोल की गोलियों से नरकगामी हुआ l
सावरकर जी तथा गाँधी दोनों को ही भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में कारावास भुगतना पडा, वीर सावरकर जी को लन्दन में 13 मार्च, 1909 को बंदी बनाया गया उनको 50 वर्ष का सश्रम कारावास का दंड दिया गया, 1911 से 1921 तक उन्हें अंडमान की काल कोठरी में बंद रखा गया l
6 जनवरी 1924 को उन्हें कारावास से मुक्त करके रत्नागिरी जिले में आबद्ध रखा गया, 10 मई 1937 को यह प्रतिबन्ध समाप्त हुआ l
1941 में भागलपुर में हिन्दू महासभा के अधिवेशन के सम्बन्ध में 8 दिन,
1948 में गाँधी वध के अभियोग में अभियुक्त होने के कारण 13 महीने,
फिर 1950 में नेहरु लियाकत समझौते के समय 100 दिन ... वीर सावरकर जी को कारावास सहना पडा l
कुल मिलकर सावरकर जी 5585 दिन प्रत्यक्ष कारागार में, 4865 दिन नजरबंदी में रहे... दोनों को मिलकर 10410 दिन (28 वर्ष 200 दिन) आत्मार्पण के दिन तक उन पर गुप्तचरों का पहरा रहता था l
गाँधी को कुल 7 वर्ष और 10 महीनो का कारावास का दंड दिया गया, जिसमे 905 दिन का कारावास उन्हें भुगतना पड़ा और 1365 दिनों के लिए स्थानबद्ध किया गया, अर्थात उन्हें कुल 2270 दिन (6 वर्ष 80 दिन ) कारावास में काटने पड़े, इनमे से अधिकतर समय वे प्रथम श्रेणी के विशिष्ठ बंदी रहे l एक अंग्रेज जेलर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है की एक कैदी के लिए पहली बार सरकार से ऐसे आदेश प्राप्त होते थे की कारागार की सलाखैएँ बंद न की जाएँ.. कहीं गाँधी जी को बुरा न लग जाये l
तो दूसरी और सावरकर को सजा मिलती थी सारा दिन कोल्हू चला कर 30 पौंड तेल निकलने का... निरंतर... लगातार ... अथक ...यदि कम रह गया तो फिर कोड़ों की सजा मिलती थी
Wednesday, 26 December 2012
भारत में तर्क और प्रयोग के प्रति नजरिया .
भारत वर्ष में ज्ञान के भंडार और उनके द्रष्टा ऋषियो के प्रत्ये पवित्र भाव रहा है.
इस बाबत में एक भौतिक वादी विचार्कने कहा की " त्रयोवेदास्य कर्तारः भान्दर्तुनिशाचारा:"
मतलब तीनो वेदों को बनाने वाले पाखंडी और निशारो है. एसा विक्रू वक्तव्य देने वाले के साथ
कोई भी दुर्व्यवहार नहीं हुआ . इतनाही नहीं बल्कि ये उनका स्वतंत्र सोच है एसा स्वीकार करके
उन्हें दर्शनकार का स्थान मिला.
Monday, 24 December 2012
भारत मे विज्ञान की
उज्ज्वल परंपरा
* सामान्य तौर पर भारत के लोगो में यह सोच घर कर है की विज्ञान के क्षेत्र में सूरज की पहली किरण पश्चिम में आई
* लेकिन बीसवी सदी के प्रारंभ में जग्दिश्चंद्र बासु ,प्रफुल्चंद्र रॉय , रावसाहेब वजे,विजेन्द्रनाथ सिल जेसे विद्वान लोगो ने आपने गहन अधययन द्वारा दुनिया को बताया की भारत सिर्फ धर्म के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि विज्ञान और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भी अग्रेसर है.
* पश्चिम में तर्क और प्रयोग का नजरिया.
- सबसे पहले कोपर्निक्स ने ऐसी मान्यता स्थापित की थी की सूर्य स्थिर है. और पृथ्वी सूर्य की और गुमटी रह ती है. लेकिन उस समय पश्चिम में समज की विचारधारा ऐसी थी की किसी भी प्रश्न का उत्तर पाने के लिए एरिस्टोटल कोही प्रमाण मानते थे.
यह दर्शाता है की वहा पर तर्क और प्रयोग को ज्यादा प्रधान नहीं दिया जाता था.इसपर एक रोचक कथा प्रस्तुत करता हु| एक बार लन्दन में विद्वान लोग बैठ कर विचार-विर्मश कर रहे थे, विषय था घोड़े के मुह में कितने दांत होते है? हर विद्वान अलग-अलग नंबर बता रहे थे इसलिए उत्तर नहीं मिलरहा था.
इतने में एक विद्वान
ने कहा की क्यों न
देखले की इसबारे में
एरिस्टोटल ने क्या लिखा
है?
सुनकर एक विद्वान खड़े हुए और पुस्तकालय में से एरिस्टोटल का पुस्तक लेकर आये. कोने में खड़ा एक युवक ये सब देख रहा था.वो बहार चला गया.किसी का भी ध्यान उस पर नहीं था. लेकिन जब वो वापस आया तो सब हेरानी से उसको देखने लगे.युवक अपने साथ घोडा लेकर आया था.उसने गुस्से से कहा एरिस्टोटल को युही क्यों परेशां कर रहे हो? ये रहा घोडा गिनलो दांत.
ने कहा की क्यों न
देखले की इसबारे में
एरिस्टोटल ने क्या लिखा
है?
सुनकर एक विद्वान खड़े हुए और पुस्तकालय में से एरिस्टोटल का पुस्तक लेकर आये. कोने में खड़ा एक युवक ये सब देख रहा था.वो बहार चला गया.किसी का भी ध्यान उस पर नहीं था. लेकिन जब वो वापस आया तो सब हेरानी से उसको देखने लगे.युवक अपने साथ घोडा लेकर आया था.उसने गुस्से से कहा एरिस्टोटल को युही क्यों परेशां कर रहे हो? ये रहा घोडा गिनलो दांत.
Subscribe to:
Posts (Atom)

