Monday, 24 December 2012

   भारत मे विज्ञान की   
  
              उज्ज्वल परंपरा 






* सामान्य तौर पर भारत के लोगो में यह सोच घर कर है की विज्ञान के क्षेत्र में सूरज की पहली किरण पश्चिम में आई

*  लेकिन बीसवी सदी के प्रारंभ में जग्दिश्चंद्र बासु ,प्रफुल्चंद्र रॉय , रावसाहेब वजे,विजेन्द्रनाथ सिल जेसे विद्वान लोगो ने आपने गहन अधययन द्वारा दुनिया को बताया की भारत सिर्फ धर्म के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि विज्ञान और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भी अग्रेसर है.  

*  पश्चिम में तर्क और प्रयोग का नजरिया.

-  सबसे पहले कोपर्निक्स ने ऐसी मान्यता स्थापित की थी की सूर्य स्थिर है. और पृथ्वी सूर्य की और गुमटी रह ती है. लेकिन उस समय पश्चिम में समज की विचारधारा ऐसी थी की किसी भी प्रश्न का उत्तर पाने के लिए एरिस्टोटल कोही प्रमाण मानते थे.
यह दर्शाता है की वहा पर तर्क और प्रयोग को ज्यादा प्रधान नहीं दिया जाता था.इसपर एक रोचक कथा प्रस्तुत करता हु| एक बार लन्दन में विद्वान लोग बैठ  कर विचार-विर्मश कर रहे थे, विषय था घोड़े के मुह में कितने दांत होते है? हर विद्वान अलग-अलग नंबर बता रहे थे इसलिए उत्तर नहीं मिलरहा था.


इतने में एक विद्वान 
ने कहा की क्यों न 
देखले की इसबारे में 
एरिस्टोटल ने क्या लिखा
है?
सुनकर एक विद्वान खड़े हुए और पुस्तकालय में से एरिस्टोटल का पुस्तक लेकर आये.  कोने में खड़ा एक युवक ये सब देख रहा था.वो बहार चला गया.किसी का भी ध्यान उस पर नहीं था. लेकिन जब वो वापस आया तो सब हेरानी से उसको देखने लगे.युवक अपने साथ घोडा लेकर आया था.उसने गुस्से से कहा एरिस्टोटल को युही क्यों परेशां कर रहे हो? ये रहा घोडा गिनलो दांत.


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